अलग है जुदा है
लिहाफ जो चढा रखा है उतार कर फेक देना चाहता है
जो दुनिया के सामने है]
असल में है ही नही वो
ख्वाहिसो के बेजा तमाशो में उलझा हुआ , जबरदस्ती का कुछ कुछ पिन्हाए हुए ......
माजी टटोलने पे कभी कभी
मिलता है कोने में खड़ा वो भी , तन्हाई में
किसी दिन झंझोर कर देखना होगा
शायद कही से टुकडो में गिरे वो सख्स जो
मेरे जेहन में रहता
है , लफंगों से फिरता है भीतर से ही ..
टुकडो में मिल जाये
तो अच्छा है
किसी दिन आ के मिला
अचानक से गर पूरा का पूरा ,तो गुनाह हो जायेगा