जोर की बारिश है।रविवार है ,एक रेस्टोरेंट में मैं हूँ मेरे
साथ मेरा बॉस है । शहरी विकास मंत्रालय से आये फतवे पर तुरंत काम करना है इसलिए सन्डे को भी रगड़
मारी जा रही है ।खीज धीरे धीरे चूम कर जाती है लेकिन मुस्कुराना
जरुरी है । चार लड़कियां बैठी हैं,मेरी सामने की टेबल पर। इनमे से एक का मेरी नजरो से सम्वाद कायम है ।
ये बात बॉस ने बखूबी भांप ली होगी । सो अब मुझे
चार जोड़ी नजरो को सम्भालना है । तगड़े जुकाम के दरमियाँ हॉट कॉर्न एंड सॉर सूप पी
रहा हूं। क्षण भर पहले मिली नजर अब परिचित होने पर है। मेरी ओर देख कर गर्दन घुमा
कर अपनी सहेलियों में घुलने में नाकाम कोशिश। अक्सर रेस्तरां का आकर्षण समझ से परे
होता है , मानो चाय की प्याली में आया सुगर क्यूब
हो जो चाय में थोड़ा घुल कर भी थोड़ा सा बचा रह जाये। और अंत में घुलने से
इंकार कर दे । बार बार कपडे ठीक कर रही है ,कभी कालर तो कभी शर्ट के निचे के दोनों हिस्सों
को मिला कर खीचना । इससे बटन्स के बीच की शाफगोई बासफाई सिल जाती है। असहजता हलके
परिचय के बाद सहज ही होती है ,सो हो रही है।
बिल ,बॉस पे करता है ,मैं अपने एक जोड़ी फ़ोन दो जोड़ी डॉक्यूमेंट फोल्डर ,एक टेबलेट समेटता हूं। नजर की अंतिम
खुराक । नजरो से ही बाये होता है पलक कुछ सम्भालती है । एक पटाक्षेप ,और बाहर की हलकी बारिश धीरे धीरे कम होती हुई। अन्दर जाने क्या बरस रहा है ।
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