Saturday, 16 May 2015

मैं पाठक को ऊल जुलूल बकवास का वचन देता हूँ


लिखना क्या है , दर्ज करते जाना है गुजरते पल को , एक सांकेतिक घोषणा है जो घटित हो रही है हर एक पल में ,जिसको लिबास की कमी मिली तो कभी उर्दू पहनती है कभी हिंदी। ये असमंजस का बुखार है , क्षणिक अवसादो का खुमार है जो समय दर समय रेंगता सा चढ़ता है और बेचैन कर देता है जब तक झटक के उतार ना दिया जाये। इसे सृजन नही कहा जायेगा  ये विघटन का परिकल्पित स्वरुप है जो अवसादी ह्रदय से बहार निकला है । ये तो बाद में सृजन कहलाता है । कविता नज्म शेर लेख गद्य पद्य नवजात के जैसे होते हैं , कोई इनका सृजन जान बूझ कर नही करता बस बन जाते हैं  , बच्चे हैं हो जाते हैं कोई सोच कर नही करता , लेख हैं लिख जाते हैं कोई सोच कर नही लिखता , कम से कम मैं तो नही सोचता
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रुको यार ठहरो , जरा दुर्दशा देख लेने दो, जरा यकीन तो आये के ये मेरा दिल कमबख्त है जो कटे हुए अंग के जैसे नेप्त्थ्य में तड़प रहा है । ये सांप इस गली में आ कैसे गया? जब से आया है और अंतिम खबर लिखे जाने तक लोगो की तीखी नजर का शिकार है सब उसपर केरोसिने डाल कर मार देना चाहते हैं। 
रुको यार देखने दो । असल में   यार हम बड़े खुराफाती खिलाडी किस्म की प्रजाति रहे हैं शुरू से । जिन जिन बातो से मेरा वास्तव में कोई वास्ता नही होना चाहिये था उन सब बातो से मेरा वास्ता रहा है 
बड़े बड़े दांव पेंचो में इतना माहिर रहा हूँ की खुद का डूबना भी बस एक तमाशा लग रहा है 
                                    
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समय के रहगुजर इतनी आसान हो जाती है जब आप प्यार में होते हैं , मानो शुरू करते ही सब कुछ इतना तेज़ हुआ के आप को मंजिल मिल गयी । हिज्र की राह पदयात्री की होती है , कार से नही तय की जाती , अकेले चलना होता है । इसका चालक खुद इसका सवार होता है । कमसिन हमसफ़र की पसीजती गर्दन पर रखे संयमी  हाथ एक दिन कंटीले बबूल की फुनगी पर खोयी हुई पतंग के जैसे लटके मिलते हैं 

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आदमी है क्या बे , दो नैन ,दो हाथ पैर, किडनी दिल और धड़कन। दिन भर अथाह अपने जैसो के बीच घूमता है फिर अपने वाले की तलाश में दर बदर तन्हाई का तमगा लगाये फिरता हैं

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