फिर से वही मुसीबत , ना सुकून को परिभासा मिल रही है ना सहूलियत को आयामसाल के कुछेक दिन ऐसे ही होते हैं । बेमानी ही होगी अगर इनको असल जिन्दगी में ढूडने बैठेंगे
अजीब दिन होते हैं ऐसे ,जब एक मुश्त मष्तिष्क का एक एक कोना सिर्फ एक ही जगह टिक कर पूरा दृश्य खंगाल ले , आवारा घूमने का दिल करे , किसी पार्क के बहार बनी सीढियों पर बैठ के आती जाती गाडियों के फ़्लैश लैंप की रौशनी का कोलिसन होते देखे।
ऐसी चम्पी कराने का मन करे जिसमे सर की एक एक कोशिका तेज़ आंधी में खुलती-बंद होती किताब के जैसे उद्दंडता करे , या फिर तेज़ हवा में उड़ते कागज के जैसे ऊपर जा के नृत्य करता हुआ निचे गिरे
कभी बारिश में रूह तक भीगा दी जाये ,भीगे कपड़ो में ही पकोड़े खाने के लिए मन बेचैन हो उठे।
आज भी दिन अजीब है कुछ । वजहे अलग हैं , उपरोक्त से परे , कुछ रोज के लिए डेल्ही आया हूँ। उसके बारे में ख़याल आना लाजमी हैं। बिना वजह ख्याल में आना बस उसी की आदत रही है । उसकी आवाज में खुदाई टपकती थी , मैं उसको अक्सर दिमाग में द्रश्यित कर लेता था बात करते वक़्त।
आज फिर ख्याल में आ गयी , क्या कर रही होगी अभी , मेट्रो में होगी या कोई सड़क क्रॉस कर रही होगी , बैग ले कर किसी फाइल को हाथ में सम्भाल रही होगी या फिर हाथ से आधी स्क्रीन ढक कर मोबाइल पे टाइम देख रही होगी , पेशानी पे बल पड़ रहे होंगे क्या?
शायद रोड की दूसरी पट्टी पे खड़े व्यक्ति को देख कर अचानक सोचा होगा - "कहीं "मैं " तो नही हूँ?"
जरा से भी समान दिखने वाले व्यक्तित्व में मुझसे समानताये ढूंढ ली होंगी , "जरा सी हाईट और होती तो एक दम वही है , नही नही ये तो वही है ,बदल गया होगा कुछ , ये वही है " उचक के बुलाने से पहले ही भ्रम में दरारे आ गयी होंगी , यथार्थ ने भ्रम की दरारों से सेंध मारकर संपूर्ण मंतव्य को आडम्बर घोषित कर दिया होगा।
कुछ रिश्ते उलझाव के साथ आते हैं मुद्दत तक पता नही चलता के करे क्या उस रिश्ते का , कुछ सम्भावनाये न दिखना ही अवस्यम्भावी हो जाता हैं ..
एक ही शहर में हूँ अभी , मैं हौज खास वो करोल बाग , मैं अपने रोजगारी फसाद में उल्झा ,शब्दों में रिश्तो की सलवटे तलाश रहा हूँ वो शायद कुछ और कर रही हो।
बहुत ठण्ड है आज , कोहरा भी जम के बरस रहा है , कार के शीशो पर तगड़ी ओस फैली है जैसे सदियों से खड़ी हों। कारो के भीतर लेकिन ठण्ड नही होगी, अगर कुछ देर बैठा जाये तो ,
एकदम यही हाल रिश्तो का है ,तमाम ओस जमा है ,सर्द हो चुके हैं अवशेस तक । पर गर्माहट है , बस कुछ देर बैठने की देर है
(जनवरी की सत्रहंवी तारीख २०१५ )
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