Tuesday, 9 July 2013

अबरू कि कटारी को दो आब और जियादा


 परमानन्द कि परिभाषा बड़ी विचित्र गढ़ी गयी है 
वो बोले के उस एक ईस्वर में सैट चिट् आनंद है , वही एक परमानंद है , मैं माफ़ी चाहूँगा ऐ खुदा , मुझे तो ऐसे ही आनंद मिल जाता है - फिर चाहे वो सुबह के अखबार कि आवाज से मिले, या किसी हुस्नियत कि अमीर के सहारे आँखे सेकने से , या फिर "सुन के रहत कि आवाजे यूँ लगे कहीं सहनाई बजे जैसा कुछ सुन कर के "

एक सुबह छत पे सोते हुए  आप उल जुलूल आवाजे सुन के कान पे चादर रखते हैं .....उस तीव्र स्वर  वाले काग को बोलते भी हैं कि सो लेने दे भाई रात में देर में सोया था लेकिन उस कमबख्त काग को भाई चारे का तनिक ख्याल नही है ...अपने इलाके कि कुछ मक्खिय भी ला के आप के सफ़ेद ठन्डे चादर पे बिठा दी आ के...........चमकती सफेदी के साथ शनि देव के पिता श्री पूरब से झाँकने कि कोशिश में आपके बगल वाली रेलिंग से टकराते हुए तिरछी निगाह से परेशां करने कि तयारी में हैं , पीछे के मकान से किसी बच्चे कि इंग्लिश में कुछ रटने कि आवाजे आ रही हैं .सामने वाले मैदान में कुछ झाड़ू जैसी लगायी जा रही है 
हट करने कि आवाज से इतना पक्का हो गया है कि किसी कि स्वचालित गाय या भैंस स्वयामानुसार नही चल रही है ...बगल में राखी पानी कि टंकी में पानी भरने कि आवाज साथ में जुगलबंदी में है ..बगल में या कहीं दूर किसी को पूर्ण परमानंद कि खोज है , बजाये चला जा रहा है "भोले को नहला दे मेरे शंकर को नहला दे "
लेकिन अपना भी पुराना रिश्ता है इस सबसे , बेशर्मी से थोड़ी सी नाक खोल कर सोने कि कोशिश में कई बार घंटो कामयाब हुआ हूँ , ...............
अबरू कि कटारी को दोआब और जियादा 

लेकिन मजे कि बात देखो आज इस सब को याद (पंखे कि साये साये ने हालाँकि झींगुर कि झाए झाए दबा दी है )कर के भी वही परमानन्द प्राप्त  हो रहा है जो उस दिन से ले कर आज तक शायद भोले को नहलाने से प्राप्त होता ....
भोर का नभ

राख से लीपा हुआ चौका
(अभी गीला पड़ा है)

बहुत काली सिल जरा-से लाल केशर से
कि धुल गयी हो

स्लेट पर या लाल खड़िया चाक
        मल दी हो किसी ने

नील जल में या किसी की
        गौर झिलमिल देह
जैसे हिल रही हो ।

और...
        जादू टूटता है इस उषा का अब
सूर्योदय हो रहा है।       (शमशेर बहादुर कृत )


चौरासी लाख योनियों में भटकने के बाद भी आनंद कि खोज अगली योनी में ढूँढना बदतर नही बदतरीन है ,

समझ आ जाता है कभी कभी कि क्या मजाक होता है खुद से ही ,
सरसराती हुई ट्रेन आपके विपरीत दिशा में गुजरती है आपके बगल में , कार कि गति 40 के पास हो और बगल से लग भग छूता हुआट्रक निकलता है , पता है क्यों , क्युकी आप आनंद ढूँढ रहे थे , चलती ट्रेन में , वरना ४० कि स्पीड वाला ट्रक कभी कार को छूता हुआ न जाता
जब आप पसंदीदा गजल के पसंदीदा अंतरे को सुनने ही वाले हो और ट्रक ने होर्न बजा दिया हो
सामने खड़े दो स्कूली बचे आपके डरी हुई रूह को देख हसे हो
रिक्शा वाले पे गुस्सा निकला हो और गाड़ी का सीसा खोले हुए ऐ सी चलाया हो ,





No comments:

Post a Comment

Related Posts Plugin for WordPress, Blogger...