कभी मैंने तुम्हारे अक्स तक से अंदाज़ा लगाया था. वजूद फूंक दो तो तुम्हारे नक्श में जज्ब होना क्या मुनासिब भी ना होगा, एक अरसा हो चला प्यार और इश्क बुत वफ़ा जफा से मेरी तर्ज़ इ गुफ्तार अलग हो चली हैं ....इन सबसे बस मुंह का जयका ही ख़राब होता है , गोया इन सबको छोड़ किसी और विषय को उठा के लिखने पर वैसा ही मजा आता हैं जैसे गर्म पानी की बोतले पेट पर लुढकाने पे ...
गालिबन ये सुनिये गजल जीत सिंह को
"खुमार ऐ गम है महकती हवा में जीते हैं "
No comments:
Post a Comment