भयंकर ऊब देखी है कभी , जब अंग प्रत्यंग किसी भी मुद्रा पोजीशन में असहज ही महसूस करते हैं , अभी तो कुछ देर पहले कुर्सी पे बैठा था अब फिर से तीव्र मंशा जाग उठी है की उसी पे बैठो मानो ख़ाक कर देनी वाली धुप में पतंग उड़ाने की आज्ञा ना मिली हो जबकि आपसे आठ नौ फीट की ऊंचाई पे पेंच पे पेंच लड़ रहे हो.
तसल्ली को परिभासा नही मिल रही है ऐसी असहजता क्यू है , करने को बहुत कुछ है पर हो क्यू नही रहा , सब की सब तारतम्यता मानो ऊँगली में अंगूठी के जैसे फस के रह गयी हो
क्या मुझे धार्मिकता का बेडौल स्वरुप अपना लेना चाहिए , क्या तिलक चन्दन वालो को बिना बात असहजता नही होती ..
कहीं ये सर दर्द तो नही है , दांत दर्द तो बिलकुल भी नहीं है
क्या रोज सुबह पार्क में टहलने वालो को ऐसा होता होगा
फफक कर बिना आवाज रो लेने से भी क्या कोई बतायेगा की ये क्यू है
इतनी कुव्वत नही है की समझ सकू हर चीज को , हाँ वाकई नहीं है ,
माँ से लिपट कर सोना याद है ऐसे में , दुःख और गलतियाँ छुपाते उसी से थे लेकिन एक साहस उसी से लिपटने में मिलता था , दर्द खीचना मानो आदत है उसकी ,जन्म से ले के अब तक हर एक दर्द का कतरा कतरा जिसको अपनी गलतियों से हम सीचते आ रहे है, वो खीचती आ रही है , लत है उसकी ,
मेरी ख्वाहिश है के मैं फिर से फ़रिश्ता हो जाऊ
माँ से इस तरह लिपट जाऊ के बच्चा हो जाऊ
वो शहर फ़कीर की मुट्ठी जैसा था , जब खोलता था दुआए निकलती थी
वो शख्स जो दिन भर की थकन के सहारे मुस्कुरा कर के जिन्दगी भर बताता रहा के वो प्यार करता है , जिन्दगी लगा दी चंद जिन्दगिया बनाने मे उसने , आज भी वो अपनी हस्ताक्षर के जैसा ही है , बदला नही है जरा सा भी ,बस शांत रहता है ,
ये गजब ही खुदाई है , दरख्तों को छोड़ते वक़्त कोई नही सोचता पत्तो की सर सर और खर खर हमेशा सतह पर साथ चलेगी लेकिन चलती है
जिनको उगते चाँद की लोकेशन किसी दरख़्त के सहारे पता चली हो वो दरख़्त ही ना रहे तो क्या चाँद उगेगा ?
बस यही सब असहज करते है , घर और शहर छोड़ना आसान है , छोड़ कर रहना बहुत मुश्किल
ये सब इतनी शर्ते क्यू लगा दी आजाद ,चीटी मार ,कुल्फी छाप शख्स पे के बेचारा बिना सल्तनत ताउम्र के लिए गुलाम हो गया
13 november 2012 OM MISHRA
(स्याह रात ) ( NEW DELHI)
तसल्ली को परिभासा नही मिल रही है ऐसी असहजता क्यू है , करने को बहुत कुछ है पर हो क्यू नही रहा , सब की सब तारतम्यता मानो ऊँगली में अंगूठी के जैसे फस के रह गयी हो
क्या मुझे धार्मिकता का बेडौल स्वरुप अपना लेना चाहिए , क्या तिलक चन्दन वालो को बिना बात असहजता नही होती ..
कहीं ये सर दर्द तो नही है , दांत दर्द तो बिलकुल भी नहीं है
क्या रोज सुबह पार्क में टहलने वालो को ऐसा होता होगा
फफक कर बिना आवाज रो लेने से भी क्या कोई बतायेगा की ये क्यू है
इतनी कुव्वत नही है की समझ सकू हर चीज को , हाँ वाकई नहीं है ,
माँ से लिपट कर सोना याद है ऐसे में , दुःख और गलतियाँ छुपाते उसी से थे लेकिन एक साहस उसी से लिपटने में मिलता था , दर्द खीचना मानो आदत है उसकी ,जन्म से ले के अब तक हर एक दर्द का कतरा कतरा जिसको अपनी गलतियों से हम सीचते आ रहे है, वो खीचती आ रही है , लत है उसकी ,
मेरी ख्वाहिश है के मैं फिर से फ़रिश्ता हो जाऊ
माँ से इस तरह लिपट जाऊ के बच्चा हो जाऊ
वो शहर फ़कीर की मुट्ठी जैसा था , जब खोलता था दुआए निकलती थी
वो शख्स जो दिन भर की थकन के सहारे मुस्कुरा कर के जिन्दगी भर बताता रहा के वो प्यार करता है , जिन्दगी लगा दी चंद जिन्दगिया बनाने मे उसने , आज भी वो अपनी हस्ताक्षर के जैसा ही है , बदला नही है जरा सा भी ,बस शांत रहता है ,
ये गजब ही खुदाई है , दरख्तों को छोड़ते वक़्त कोई नही सोचता पत्तो की सर सर और खर खर हमेशा सतह पर साथ चलेगी लेकिन चलती है
जिनको उगते चाँद की लोकेशन किसी दरख़्त के सहारे पता चली हो वो दरख़्त ही ना रहे तो क्या चाँद उगेगा ?
बस यही सब असहज करते है , घर और शहर छोड़ना आसान है , छोड़ कर रहना बहुत मुश्किल
ये सब इतनी शर्ते क्यू लगा दी आजाद ,चीटी मार ,कुल्फी छाप शख्स पे के बेचारा बिना सल्तनत ताउम्र के लिए गुलाम हो गया
13 november 2012 OM MISHRA
(स्याह रात ) ( NEW DELHI)
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