15 NOVEMBER 2014
कृपया ध्यान दीजिये गाड़ी नंबर एक दो आठ शून्य तीन पुरी से आने वाली मुग़ल सराये इलाहाबाद के रास्ते नयी दिल्ली जाने वाली पुरषोत्तम एक्सप्रेस प्लेटफार्म नंबर छह पर खड़ी है ।
अभी अभी इलाहबाद से लौटा हूँ , रात के ११ बजे तक घर पर आने की ख्वाहिश को धता बताते हुए भारतीय रेल ने एक बार फिर बताया के वो बदली नहीं है।फिलहाल एक बज रहे हैं और नींद कहीं किराये पे गयी है ।चेहरे की मुर्दानी अवस्था में बस दो आँखे ही हैं जो जीवित दिख रही हैं. रेलवे स्टेशन पर कोई नूर भी नही दिखा जो चेहरे पे शराफअत और रहिसियत का झूठा मुलम्मा चढाते ।
ऐसे केस में बस लिखने का ही मन होता है सो करने बैठ गए ।जूस निकलने वाली मशीन और हम सबकी जिन्दगी में एक बड़ी सटीक सिमिलरिटी है - दोनों रस भरे आदमी का कचूमर निकल देती हैं ।अभी जिन्दगी का चौथाई हिस्सा भी पूरा नही हुआ है शायद लेकिन उसके खिलाफ नफरते एक अच्छा खासा कोना बना चुकी हैं दिल में।
इलाहबाद में ही था मैं जब फ़ोन आया था . बड़ी ख्वाहिश से किसी ने बताया था के वो लौट के आया है ।शायद उसकी ख्वाइश रही होगी के कोई इंतज़ार में होगा तो लौट आने की खबर देने में विलन के मारे जाने जैसा सुख मिलेगा. ।
लेकिन कौन कमबख्त इंतज़ार कर रहा था, कोई भी तो नहीं , बनिस्बत उसके जाने के बाद मेरा कोई काम न तो रुका और न ही आने के बाद बन् ने वाला है, सब तो खुदाया वैसा ही चलेगा ।
न जाने क्या सोच के किसी ने लौटने की खबर दी है ।
कुछ काम जिन्दगी में उत्तर प्रदेश बोर्ड की माध्यमिक परीक्षा में बेहतरीन अंक लाने की भांति चमकीले होते हैं लेकिन खोखले भी ., देखने में हसीन लेकिन जिदंगी के किसी भी अगले कदम में मदद न करने वाले काम ।
कुछ दिन पहले एक महाशय अपने सुपुत्र को मुझसे मिलवाने लाये थे ,
"उनको पता था की मैं अभी बेरोजगार हूँ , शायद मुझे उदाहरनार्थ पेश करना चाहते थे अपने सुपुत्र को , की देख ले भाई १२वी के मार्क्स किसी काम नहीं आते। , "
93.5 प्रतिशत है यु पी बोर्ड की १२ वी में भाई!
उसकी शक्ल देख के नही लग रहा था की उसके इतने मार्क्स आ सकते हैं , तथापि मैंने यु पी बोर्ड की सिक्षा प्रणाली का ख्याल कर के खुद पे कण्ट्रोल किया।
टी वी पे खबरे छौंका मर रही थी डीयु में एडमिशन में लगने वाले है हाई मेरिट वालो का ताँता।" , इस के ९८ % , उसके ९६% , उसके सामने तो उसकी शक्ल यु पि बोर्ड की सिक्षा प्रणाली के समान ही बनती जा रही थी।
मानो पहली बार बेचारे ने फ्रीजर से बर्फ निकलने की कोशिश की हो और आइस ट्रे ही ना निकल रही हो।
अब चूंकि हमारे आस पास का समाज किसी के बुलाने पर मिलने जाने की वकालत करता है तो मैं भी लौटने वाले से मिल ही लूँगा . बेहतरीन न सही बेहतर तो रहेगा ।
किसी से कहा तक चुप रहोगे आप , नहीं रह सकते ,जबकि आप भी जानते हो की आपका दिल नारियल जैसा है।
कोई फ़ना होने तक का जज्बा दिखा जाये तो भी आपके मुंह से इनकार ही निकले तो मुसीबत आपके मुंह की है ,सामने वाले की ख्वाहिश की नहीं।
मिल के सब कुछ समझाना ही तो हैं , इश्क की आखिरी किश्त समझ कर अदा कर देंगे। चमकीले कामो की चमक कितनी फीकी थी यही तो बताना है और अगर कुछ चमक थी भी तो वो समय ने रगड़ के मनहूस कर दी है। रही सही कसर बदली हुई प्राथमिकताओ ने पूरी कर दी।
मुझमें अब भी थोडा सा पहले जैसा मैं बचा हूं .... जब भी आइना देखता हूं , ये एहसास होता है
जिन्दगी सिर्फ दो लोग के साथ मिलने रहने खाने का नाम नहीं है , न तो कोई सिमरन बन पायेगा न राज क्युकी जिन्दगी नामक अमरीश पूरी DDLJ के अमरीश पूरी से कही जादा बडा विलन है जिसके डायलोग आठो पहर आपको सोला दुनी आठ और बारा चोको साठ सिखाते रहेंगे और आप हामी भरते रहेंगे भले ही आपका आयतन उतना वॉल्यूम लेने का हो या न हो ।जिन्दगी अपने आप को उड़ेलती रहेगी गरम मोम की भांति ।
अब जा के जिन्दा आँखों का नींद से करार हुआ है ।
बकने में अलग मजा है बकते रहिये
फिलहाल ये सुनिए -
15 NOVEMBER 2014
(स्याह रात ! चीनी मिटटी के बड़े कप की चाए के साथ )
कृपया ध्यान दीजिये गाड़ी नंबर एक दो आठ शून्य तीन पुरी से आने वाली मुग़ल सराये इलाहाबाद के रास्ते नयी दिल्ली जाने वाली पुरषोत्तम एक्सप्रेस प्लेटफार्म नंबर छह पर खड़ी है ।
अभी अभी इलाहबाद से लौटा हूँ , रात के ११ बजे तक घर पर आने की ख्वाहिश को धता बताते हुए भारतीय रेल ने एक बार फिर बताया के वो बदली नहीं है।फिलहाल एक बज रहे हैं और नींद कहीं किराये पे गयी है ।चेहरे की मुर्दानी अवस्था में बस दो आँखे ही हैं जो जीवित दिख रही हैं. रेलवे स्टेशन पर कोई नूर भी नही दिखा जो चेहरे पे शराफअत और रहिसियत का झूठा मुलम्मा चढाते ।
ऐसे केस में बस लिखने का ही मन होता है सो करने बैठ गए ।जूस निकलने वाली मशीन और हम सबकी जिन्दगी में एक बड़ी सटीक सिमिलरिटी है - दोनों रस भरे आदमी का कचूमर निकल देती हैं ।अभी जिन्दगी का चौथाई हिस्सा भी पूरा नही हुआ है शायद लेकिन उसके खिलाफ नफरते एक अच्छा खासा कोना बना चुकी हैं दिल में।
इलाहबाद में ही था मैं जब फ़ोन आया था . बड़ी ख्वाहिश से किसी ने बताया था के वो लौट के आया है ।शायद उसकी ख्वाइश रही होगी के कोई इंतज़ार में होगा तो लौट आने की खबर देने में विलन के मारे जाने जैसा सुख मिलेगा. ।
लेकिन कौन कमबख्त इंतज़ार कर रहा था, कोई भी तो नहीं , बनिस्बत उसके जाने के बाद मेरा कोई काम न तो रुका और न ही आने के बाद बन् ने वाला है, सब तो खुदाया वैसा ही चलेगा ।
न जाने क्या सोच के किसी ने लौटने की खबर दी है ।
कुछ काम जिन्दगी में उत्तर प्रदेश बोर्ड की माध्यमिक परीक्षा में बेहतरीन अंक लाने की भांति चमकीले होते हैं लेकिन खोखले भी ., देखने में हसीन लेकिन जिदंगी के किसी भी अगले कदम में मदद न करने वाले काम ।
कुछ दिन पहले एक महाशय अपने सुपुत्र को मुझसे मिलवाने लाये थे ,
"उनको पता था की मैं अभी बेरोजगार हूँ , शायद मुझे उदाहरनार्थ पेश करना चाहते थे अपने सुपुत्र को , की देख ले भाई १२वी के मार्क्स किसी काम नहीं आते। , "
93.5 प्रतिशत है यु पी बोर्ड की १२ वी में भाई!
उसकी शक्ल देख के नही लग रहा था की उसके इतने मार्क्स आ सकते हैं , तथापि मैंने यु पी बोर्ड की सिक्षा प्रणाली का ख्याल कर के खुद पे कण्ट्रोल किया।
टी वी पे खबरे छौंका मर रही थी डीयु में एडमिशन में लगने वाले है हाई मेरिट वालो का ताँता।" , इस के ९८ % , उसके ९६% , उसके सामने तो उसकी शक्ल यु पि बोर्ड की सिक्षा प्रणाली के समान ही बनती जा रही थी।
मानो पहली बार बेचारे ने फ्रीजर से बर्फ निकलने की कोशिश की हो और आइस ट्रे ही ना निकल रही हो।
अब चूंकि हमारे आस पास का समाज किसी के बुलाने पर मिलने जाने की वकालत करता है तो मैं भी लौटने वाले से मिल ही लूँगा . बेहतरीन न सही बेहतर तो रहेगा ।
किसी से कहा तक चुप रहोगे आप , नहीं रह सकते ,जबकि आप भी जानते हो की आपका दिल नारियल जैसा है।
कोई फ़ना होने तक का जज्बा दिखा जाये तो भी आपके मुंह से इनकार ही निकले तो मुसीबत आपके मुंह की है ,सामने वाले की ख्वाहिश की नहीं।
मिल के सब कुछ समझाना ही तो हैं , इश्क की आखिरी किश्त समझ कर अदा कर देंगे। चमकीले कामो की चमक कितनी फीकी थी यही तो बताना है और अगर कुछ चमक थी भी तो वो समय ने रगड़ के मनहूस कर दी है। रही सही कसर बदली हुई प्राथमिकताओ ने पूरी कर दी।
मुझमें अब भी थोडा सा पहले जैसा मैं बचा हूं .... जब भी आइना देखता हूं , ये एहसास होता है
जिन्दगी सिर्फ दो लोग के साथ मिलने रहने खाने का नाम नहीं है , न तो कोई सिमरन बन पायेगा न राज क्युकी जिन्दगी नामक अमरीश पूरी DDLJ के अमरीश पूरी से कही जादा बडा विलन है जिसके डायलोग आठो पहर आपको सोला दुनी आठ और बारा चोको साठ सिखाते रहेंगे और आप हामी भरते रहेंगे भले ही आपका आयतन उतना वॉल्यूम लेने का हो या न हो ।जिन्दगी अपने आप को उड़ेलती रहेगी गरम मोम की भांति ।
अब जा के जिन्दा आँखों का नींद से करार हुआ है ।
बकने में अलग मजा है बकते रहिये
फिलहाल ये सुनिए -
15 NOVEMBER 2014
(स्याह रात ! चीनी मिटटी के बड़े कप की चाए के साथ )

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