Tuesday, 5 May 2015

रात तीन बजे की आहट

पलायनवादी , नहीं नही , हो भी सकते हैं, लेकिन फिर भी कुछ चीजे ज्ञात होने पर भी भूलने की कोशिश की जाती है  मुझे ज्ञात है के जेहन और पलक के बीच कोई कतरा है जो आँखों से निकलना चाहता हैं लेकिन मुझे भूलने में सुकून लग रहा है कई बार मित्रो के साथ पार्टी मना चुके हैं पिछले कुछ हफ्तों में भूलने की कोशिश जाया नही जाती। पिछले बुरे पल कोई तो एमिनो एसिड या एंजाइम  निष्कासित करते हैं , पूरे जेहन में जलन होती है उनको सोच कर 

अलार्म लगाया था पानी भरने कोकोई कोई रात ऐसी होती है के पूरी बीत जाती है सोते हुए फिर भी  लगता है मानो मस्तिष्क जाग रहा था उसे एक एक करवट याद है कब कब ली गयी और हम बस आँखे मूंदे फैले रहे , शायद इंतज़ार और डिमांड दोनों करते रहे के अब नींद आएगी 
            जब अँधेरा हो तो और जादा अँधेरा रहता है  गोया कोई कमरे में लाईट जला दे तो पलक के पीछे तक का समां रोशन हो जाता है आँखे जोर से बंद करनी पड़ती हैं और  दिमाग पर अतिरिक्त जोर पड़ता है । खैर अलार्म से आठ मिनट पहले ही नींद खुल गयी है ,पूरा चादर पसीने से गीला है और सिमट के पीठ के नीचे आ चुका है । गंधार कला में बनी कोई नर्तकी जैसा लुक दे रहा है  तीव्रता से उठा आँखे मलते हुए , किचेन में गया नल खोला , पानी का निशान नही ,हाँ आवाज है । आहट है आने की 
             आधी रात से तीन घंटा बाद के सन्नाटे में नल की तीव्र ध्वनि एकदम समन्दर के लहरों में फसी हवा की तड़प जैसी  है बड़ा मधुर है ,मानो कोई सूर्य को अर्घ्य दे रहा है। दुर्लभ है , आहट दुर्लभ है , आसानी से नही मिला करती ये । हमको वो चीज शर्तिया कभी नही मिलती जिसकी जरूरत है । यहीं से रोस उपजता है । हमारी तार्किकता को औंधे मुंह दबा दिया जाता है और तब तक नही छोड़ा जाता जब तक हाथ पाव शिथिल ना पड जायें 

 मैं आहट के सहारे वैसे ही प्रतीक्षित हूँ जैसे विदर्भ का कोई किसान सोचता है के पानी आएगा तो सारे दुःख चले जायेंगे 
सिर्फ हम ही प्यासे नही हैं बगल के रूम के दरवाजे पे आहट मिली , लड़की निकली( बाल्टी ले कर के उनींदी सी  ,बाल बिखरे , अँधेरे में देखता तो सहम जरुर जाता , उजाले में मासूम लग रही है  ) और बाथरूम में चली गयी

आया, आया पानी आया और आते ही तीन फ्लोर्स में बंट गया ,धीरे धीरे तीनो को ही कतरा कतरा जलास्वादन हो रहा है 
मैं  गिरती बूंदे देख रहा हूँ , कुछ बूंदे टपक के मेरे पे ना गिर रही होती , तो सो गया होता खड़े खड़े ही वो लड़की व्योम की तरफ खुलने वाली सीढियों पे बैठी है , सोने की कोशिश में इंतज़ार कर रही है पानी भर जाने का दूर कोई ट्रक की आवाज आ रही है मानो गीले कीचड से निकलने की कोशिश कर रहा हो 

आखिरकार जैसे तैसे बूँद बूँद का बनाया समन्दर मेरी बाल्टी में समां गया  बाल्कनी से झाकने का मन किया, सो उधर रुख किया   बड़ी ताज़ी हवा थी , नीचे अँधेरे  छज्जे पे कुछ कबूतर थे , मैं निस्तब्ध एकदम खामोश देखा किया एक जोड़ा बिजली की तार पे बैठा है  एक दुसरे को देखते हुए मानो कह रहा हो क्यू खामोश और मायूस हो , सिर्फ हम पक्षी ही नहीं, परमपिता परमात्मा की सबसे हुनरमंद संतान भी सुखी नही है , उनमे भी ज्यादातर हैं जिनको मुसीबते हैं उनमे भी कुछ के दिमाग जागते रहते हैं कुछ की आँखे 

कबूतरी पंख फैला देती हैं ,मानो झिड़क दिया हो उसको की इंसानों के बाते मत करो 


दुनिया भर के सकारात्मक पक्ष जोड़ डाले सिर्फ जीने को प्राथमिक बनाने के लिए , कोई सार्थक जवाब नही मिला , कोई विकल्प नही सूझा तो जीते रहना सबसे आसान लगा

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