Wednesday, 19 December 2012

काल्पनिक शेर का फेसबुक डर !

मराठी लोग दुखी हैं कि उनका रक्षक नहीं रहा। कई गैर मराठी भी दुखी हैं कि उनका रक्षक नहीं रहा। मैं यह जानने की कोशिश कर रहा हूं कि इन तमाम लोगों को किसका डर है। मैं यह भी जानने की कोशिश कर रहा हूं कि जो आदमी अपने घर से बाहर निकलने से डरता था, वह उन्हें कैसे बचा सकता था। मैं मराठी हूं और इस बात पर शर्मिदा हूं कि छत्रपति शिवाजी और बाल गंगाधर तिलक के वारिस कहलाने वाले मराठी कभी गुजरातियों से डरते हैं, कभी पंजाबियों से, कभी तमिल, मलयाली क्लर्कों और टाइपिस्टों से और कभी टैक्सी, ऑटो रिक्शा चलाने वाले उत्तर भारतीयों से। मैं जीवन भर उत्तर भारत में रहा और कभी असुरक्षा या बेगानापन महसूस नहीं किया। मैं उन मराठी भाषियों के लिए शर्मिदा हूं जो उत्तर भारत में रहते हैं, जो उत्तर भारतीयों के खुले दिल और उदारता का फायदा उठाते हैं लेकिन बाल ठाकरे और राज ठाकरे के गुण गाते हैं, जो अपने राज्य में मराठियों के अलावा किसी को रहने देने को तैयार नहीं हैं। 

क्या शिवाजी के वंशज इतने डरपोक हैं कि एक लड़की फेसबुक पर बंद के खिलाफ टिप्पणी करती है और वे पुलिस से शिकायत करने दौड़ते हैं? फेसबुक के स्टेट्स से डरने वाले लोग किसको किससे बचाएंगे? अगर दीवार पर शेर की तस्वीर लगाने से कोई बहादुर हो जाता, तो अपने कमरे की दीवार पर कैटरीना कैफ का पोस्टर लगाने वाले लड़के सुंदर लड़की में बदल जाते। लेकिन सब डरे हुए हैं और सबको रक्षक चाहिए। रक्षक जानता था कि डर काल्पनिक है और वही जानता था कि वह खुद काल्पनिक रक्षक ही है, अगर सचमुच का डर होता, तो रक्षक कहीं नहीं होता। रक्षक अपने मन में जानता था कि पीछे तस्वीर का शेर भी उससे उसकी सचमुच की सेना से ज्यादा बहादुर है। 

पर अब रक्षक चला गया है और हमें प्रार्थना करनी चाहिए कि उसकी आत्मा को शांति मिले। यह भी उम्मीद है कि जो लोग सोचते थे कि रक्षक उनकी रक्षा करेगा, शायद वे महसूस करेंगे कि दुनिया में अब ज्यादा शांति है। अब उन्हें लगेगा कि डर की कोई बात नहीं थी, वे बेकार ही डर रहे थे। उनका डर काल्पनिक था और रक्षक भी।
(हिंदुस्तान अखबार से साभार)

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