Friday, 28 December 2012

वक्त के पिछले पहिये में बैलेंस नही होता ....


जिंदगी  एक अजीब काम्प्लेक्स तस्वीर जैसी है , कई तस्वीरे गूथ दी गई हैं जैसे
......काफी ढूँढने पे पता चलता है कि वर्तमान कि कई शै पुराने समय के साथ मुकम्मल हो ही नही सकती थी .....एक और परेशानी ये भी है कि हम लोग गुजरे हुए गमो को मग्निफाई कर के देखते हैं..............
 कुछ नहीं बदलती हाँ, हाँ नहीं बदलती कुछ चीजे  .....मूंगफली के ठेले से मूंगफली उठा कर दाम पूछना .....(पता नहीं वाल्ल्मार्ट ये सुविधा देगा या नहीं )........सुबह सुबह अखबार कि तलब ......सो के उठ कर चादर को लात से अलग करना ..ये वाकई नही बदला है ...............

सुबह सुबह उठा ही था कि अंकल का फोन आया ,हालाँकि वैसा सन्नाटा नहीं लगा मुझे मेरे आस पास जैसा ऐसी खबर सुन कर हिंदी फिल्मो में सुनने को मिलता है ...सन्नाटा भी सुनाई देता है ....
 घर में, कॉलेज जा रहा हूँ बोल कर निकल गया , रस्ते में खुद को जस्टिफाई करते हुए  कि मैंने अच्छे काम के लिए झूट बोला है गाड़ी के फ्यूल वाले कांटे को कई बार देखा .........उसकी नब्ज हल्की थी ...... , मेडिकल सेंटर आ गया है .....मैंने मेडिकल स्टोर के बोर्ड के निचे गाड़ी पार्क कि , मेडिकल स्टोर वाले ने मना किया ...एक बार तो मैंने सोचा कि गाड़ी के मॉडल के कारन नाराज है .....मैंने भी भले इंसान के जैसे उसकी बात को सुन लिया (अस्पताल में आये हुए लोग अक्सर इंसान बन जाते हैं ) ...........भागने कि जरूरत नही थी मुझे , छोटा सा एक्सीडेंट हुआ था उसका .....र्रेसेप्सन , कमरा नम्बर – 244 A   , थैंक यू .....मन में ख्याल  था -4 तो उसका लकी नंबर है , फिर अस्पताल के लिए बनाई गई सामजिक मर्यादाओ का पालन करते हुए लकी नंबर वाले ख्याल को टेंसन और चिंता वाले चेहरे से रिप्लेस किया .....

शायद इसीलिए पास्ट को देखने में ग्गुथी हुई तस्वीरे नजर आती है , एक समय में कितने ही  बार मन के ख्याल और फसिअल एक्स्प्रेस्सन बदलते हैं , (मुझे कभी कभी संदेह होता है कि दिमाग कि RAM कितनी है )......

हाउ आर  यू फीलिंग नाउ ? कैसे हुआ , मैं तो कितने ही  बार बोला हूँ स्कूटी में बैलेंस नही होता ,गलती से भी अगर अगला ब्रेक लग जाये तो फिसलना पक्का है .....मेरी बात को बीच में ही रोकते हुए(हालाँकि मेरी सामाजिक जिम्मेदारी पूरी हो चुकी थी ) .........अरे फिसल के नही हुआ है , That CAR …………उसने पीछे से टक्कर मारी ......ओह अच्छा , ....मैं चाय ले के आता हूँ ........

.चाय और अस्पताल के सम्बन्ध को व्याख्यायित करना अभी तर्कसंगत नहीं है (the warfare and weapon-know-how should not be taught during the battle ) , यहाँ चाय वाले के पास काफी भीड़ है , इससे कुछ ज्यादा भीड़ मिटटी के तेल के सरकारी  बंटवारे के वक्त होती है ,यहाँ भी  चाय   वाले का नाम छोटू है (ग्लोबलिजऐसन विथ इन दी  टेरिटोरी ).....छोटू को देख कपिल सिबल कि नयी शिक्षा नीति का  ख्याल  आया .....तब तक सारेगामापा लिट्टल चैम्प्स का रात का शो याद आया ,बड़े जोर शोर से घर में देखा जा रहा था ......
चाय ले कर ऊपर गया , लिफ्ट मेन से पहचान थी पुरानी सो पहले मेरे को ही ले लिया उसने ...
आरक्षित वर्ग के लोगो कि  भी कोई पुरानी पहचान है देश के रहनुमाओ से शायद , तभी उन्हें जल्दी एंट्री मिलती है
एंट्री तक ही सीमित रहते तो बात थी, अब तो पप्रोम्सन  में भी ..........continued ....

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