.......... शायद तब बेतरतीब ख्वाहिशे
इतनी बेतरतीब नहीं थी जितनी कि आज हैं , तब कि ख्वाहिशों और उम्मीदों के कद छोटे
थे , लंबी दूरी तय नहीं करती थी ख्वाहिशे .......स्कूल जाने के लिए बस एक दोस्त या
दो दोस्त मिलने थे जो पूरा रास्ता घेर कर
और राह चलते सयकिल वालो से बाये चलने कि सीख लेले कर रोज रोज ये सोचते थे कि बड़े
हो कर क्या बनना है .... तब आप्शन बहुत थे ......
वापसी के वक्त स्कूल के बहार
एक बाबा खड़ा होता था , कई चीजे थी उसके पास -शक्कर का गोला , समोसे भी ले के आता
था जो ठन्डे होने के बावजूद उसकी नजर में गर्म होते थे ...उस समय खर्चने को कुछ ही
पैसे मिलते थे ....अभी कि बात अलग है ,, ......
वो बाबा उजली दाढ़ी वाला ,
सफ़ेद कुर्ते में कुछ चटनी के दाग ,बुढ़ापा तो मानो अचानक से वैसे ही कूद पड़ा हो जैसे महाराष्ट्र
में हिंदू फनाटीसिस्म .........बाल एकदम सफ़ेद मानो उस समय टाइड ने शम्पू लॉन्च किया हो , मेरे से
पुछा ...........
खाओगे क्या आ जाओ
...नही खाना...मुझे नही अच्छा
लगता
..सच्ची ?
नही पैसे नहीं है , कल
खाऊंगा ...
....पैसे कल दे देना .....उसने बड़ा सा sugar ball हाथ में रख दिया
.....दिल में वही ख्याल आया "ये बाबा तो शक्ल से कला है पर फिर भी कितना अच्छा है ..."
..........अभी हाल(२०११) ही में जगजीत सिंह साब ने" काले " कि importance पे कोई पंजाबी लाइन बोली थी उसका हिंदी में मतलब बस इतना था कि वेद और कुरआन के सफ़ेद पन्नों का कोई मतलब नहीं जब तक कि "काली" स्याही अपना कमाल न दिखाए ..................
(NELSON MANDELA MUST HAVE LEARNT THIS LINE AGAINST AFRICAN APERTHEID )
.....दिल में वही ख्याल आया "ये बाबा तो शक्ल से कला है पर फिर भी कितना अच्छा है ..."
..........अभी हाल(२०११) ही में जगजीत सिंह साब ने" काले " कि importance पे कोई पंजाबी लाइन बोली थी उसका हिंदी में मतलब बस इतना था कि वेद और कुरआन के सफ़ेद पन्नों का कोई मतलब नहीं जब तक कि "काली" स्याही अपना कमाल न दिखाए ..................
(NELSON MANDELA MUST HAVE LEARNT THIS LINE AGAINST AFRICAN APERTHEID )
नेक्स्ट डे मम्मी से पैसे
मांगे ,
....मम्मी को क्या पता इस बारे में वो तो शुरू .....कम खर्चा किया करो
, अभी मकान बन्ने में बहुत पैसा लगा है
....दो दिन बाद लेना
समोसा मकान से बड़ा हो गया
था , या शायद इस बात कि ओर इशारा था कि रोटी इज आलवेज ग्रेअटर देन मकान
.................
दो दिन उसके सामने से
निकलने के लिए थोड़ी भीड़ का प्रयोग किया , दूसरे दिन ऐसा करते वक्त , भीड़ कि चाल के
बराबर चलने में गिर पड़ा , बाबा ने उठाया आ के ,अजीब सा डर था दिल में
बाबा ने फिर से शक्कर का
बना गोला दिया बोले पैसे कल दे देना
नेक्स्ट दो दिन बुखार ने
मुझे चुन लिया सो ..... दवा खाने कि शर्त पे मम्मी से पैसे लेने का वादा ले लिया
अबकी मम्मी ने वादा निभाया
....मुझे पैसे मिले ....पर बाबा नही था ......दो दिन तक नही आया बाबा
चार दिन हो गए ..............................................बहुत दिन हो गए स्कूल के बाहर समोसा नहीं खाया किसी ने .....५
साल तक मैं रहा तब तक तो नहीं आया
written on - 03-jan-2011 (रात के आठ ,सवा आठ ).........लिखते वक्त शायद ये गीत गुनगुना रहा था
तेरा वजूद है , सिर्फ दास्ताँ लिए .........................

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