Sunday, 6 January 2013

स्टेसन पे अधूरे ख्वाब मोल्ड होते हैं


मौसम अजीब ही ठंडा है ...बता रहा है कि वो है मानो खुदा इल्म करा रहा है................. .......कमरे में अजीब से आवाज है सन्नाटे कि  , हर कुछ मिनट के बाद लगता है , दरवाजा खुला है शायद , ये बहार कि हवा को खुदा ने पनाह नही दी अपनी छत के निचे जो कमबख्त मेरे कमरे में चली आ रही है ......
और हाँ घडी अपनी अलग ही जिम्मेदारी पूरी करती है इन दिनों , मुसलसल बताती रहती है कि ठण्ड का एवाल्युसन करने से ठण्ड कम न हो जायेगी ......रजाई तो बाहे पसारे ऐसे  देखती है मानो चिढा रही हो कि एक बार मेरे साथ हो जाओगे तो ब्रेक अप न कर पाओगे ........शेल्फ से डेवेलोपमेंट इकोनोमिक्स कि बुक ऐसे झांक रही है जैसे रजाई से दोस्ती निभा रही है , वैसे ही मिजाजपुर्सी से चिढा रही है .........अजब ही  मिजाज है ..................
पर रजाई से ब्रेक अप करने में कामयाब हुआ मैं , तैयार होता हूँ ....नीली वाली जींस कि जेब में हाथ डाल कर बाहर निकलता हूँ , बहार निकलते ही ऊपर बताई गई बातों मे और अनर्गल बातों में फर्क मिटने लगता है .......उम्मीद से ज्यादा ठण्ड है ...........रेलवे स्टेसन पर लेकिन लोगो का अलग ही  स्टाइल  देखने को मिलता है , सब अपने अपने समय से ट्रेन को चला रहे होते हैं ........और मुझे तो ताज्जुब होता है कि ट्रेन ड्राईवर ठण्ड में इन ठंडी चिकनी मासूम पटरियों को देख कर क्या सोचते होंगे
कुछ देर IRCTC के बुक काउंटर पर ...... कुछ देर अखबार में ............बायीं और नजर घुमाते ही एक लड़की बड़े बड़े दो बैग के साथ  बैठी है , ...मेरे देखते ही आँखों से पलट वार , मुझे नजरे झुकानी पड़ती हैं , जेहन पढ़ने में वाकिफ दिखती है और समाने  में एक बाबा भगवा वस्त्रों में तीन चार पोटली बनाये हुए , हाथ में अलुमिनियम कि एक बाल्टी लिए बांदा पस्सेंजर का वेट कर रहे हैं शायद .....एक बच्चा रो रहा है , रेलवे ट्रैक पे सु सु करने कि जिद कर रहा है , यहाँ ये क्लिएर  हो गया कि बच्चे बाप पे ज्यादा जाते हैं , एक महिला पानी कि बोतल के दाम के लिए झगड रही है , उसका तर्क है कि सर्दियों में भी इतना महंगा क्यों ....लेकिन बायीं और पलट कर देखना ज्यादा दिलचस्प था , .......इन्तजार करते वक्त ई बार घडी पे डाउट होता है , एक महिला बड़ी बेरुखी से शक्ल लिए बैठी है चुपचाप , जैसे चुप रहना उसके नचुरल इंस्टिंक्ट के अगेंस्ट है ....अपने खिलाफ जा कर के चुपचाप बैठी हो मानो .............

दिल में ख्याल आया , कभी कभी मैं कितना आसान हो जाता हूँ , साडी दुनिया समझ आ रही है , कोई केंस ,मार्शल , पिगू या फिर गवर्नर जनरल के रेफोर्म्स को जरा भी तवज्जो नहीं है ..............सारा आलम ऐसा है कि बस देवानंद के जैसे झूमने का मन कर रहा है .......जक्केट कि जेब से सिगरेट निकलते हुए एक साहब आ कर पूछते है , ये स्वत्रता सेनानी किस पे आएगी – दिल से आवाज आई “पटरी पर ” बट सामाजिक आस्था और व्यवहारिक व्यवस्था ने दिल को रोक कर जवाब दिया – प्लेटफार्म ३ पे ....आज ४ घंटे लेट है , अगर स्केच बनाना जानता तो इस समयढेरो ऑब्जेक्ट मिल जाते स्टिल, सारे के सारे , कुछ शाल सँभालते हुए बोले हे जा रहे है आज तो हद्द हो कर दी ठण्ड ने .........
कुछ सोचना ही  बेहतर है , तुम्हारे बारे में सोचना बेहतरीन है ...... बेवक्त  "बेवजह "ज़ेहन में दाखिल होना तुम्हारा ही काम है  ....कॉलेज के कई बंदे याद है मुझे जो मुझे देख कर तुमको याद करते थे

कुछ चीजे  अपने बस में होती ही नही है , इन चीजों को खुदा ने खत्म किया , मेरा तो कोई हाथ ही नही था ....
कई बार सोचता हूँ , दिल में पक्का गहराई होती है !!        ,,,,,,,,,,,,,,,बड़े भीतर तक के गम उचक के बहार आते है , कोई उत्प्लावन बल भी शायद , या फिर गमो का जिओसिन्क्लाइन या फिर गमोसिंन्कलाइन
और ख्वाहिसो पे कोई लगाम तो है नहीं , मेक्सिकन घोडो के जैसे भागती हैं ,कहाँ तक कोई रोक पाता है
ठण्ड बढ़ गई और गाड़ी कि लेट लतीफी भी ...मुझे खुशी है .....मुझे रेलवे स्टेसन से अजीब ही लगाव् है ,,,जिंदगी टुकडो में दिखती है यहाँ , कोई खुशी में जा रहा है , कोई गम में , कोई गम न हो इसलिए जा रहा है , कोई इसलिए कि खुशी जिदगी भर साथ रहे ......लेकिन सब दीखते एक हे जैसे हैं पेशानी पे लेट लतीफी कि चिंता लिए हुए,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,.....ठण्ड बढते ही मेरी सिगरेट जलती है ........किसी कि रकीब थी ये सिगरेट ........
आज पूरा २ साल हो गया , तभी स्टेसन आया था , बाकि मेरी कोई गाड़ी नही आने वाली , न ही मैं कहीं जाने वाला हूँ ,...........रजाई से तो ब्रेकअप कर लिया था पढाई से नही कर पाउँगा ..........
हर बार जनवरी ऐसी ही होती है अब
....................................................WRITTEN ON – 4-JAN-2011(11PM)
                                                                 


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